शिक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य, वृद्ध सेवा एवं पशु संवर्द्धन का राष्ट्र व्यापी तीर्थ

मानव सेवा भारतीय संस्कृति, अध्यात्म व दर्शन के जगत में एक नए अध्याय का शुभारंभ मध्यप्रदेश के मालवांचल क्षेत्र से हुआ। वर्ष 1998 से अपनी बहुआयामी योजनाओं के कारण पुष्पगिरी तीर्थ मानव सेवा की ऊंचाईयां अर्जित करता गया। यह आज नहीं तो कल रेखांकन योग्य स्वर्णिम प्रमाण बनकर अंकित होगा कि कोई पग बिहारी, पिक्षिका, कमंडलधारी, आत्मन्वेषी श्रमण संत की मानस्विता में जनकल्याण की भावनाओं का वह लोकाकाश व्याप्त है, जो मानवीय संवेदनाओं से जुडा है। वे श्रमण संत जैन जगत में पुष्पगिरी प्रणेता 108 आचार्य श्री पुष्पदंत सागर के नाम से विख्यात हुए। वर्तमान में आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी देश के 17 प्रांतों का भ्रमण करते हुए एक लाख तीस हजार किलोमीटर की पग यात्रा पूर्ण कर ससंघ पुष्पगिरी तीर्थ क्षेत्र में विराजमान है। उनकी परिकल्पना का यह क्षेत्र मानव उत्थान की दिशा में प्रगति के पथ पर है। आचार्य श्री की परिकल्पना में वर्ष 2015 में एक ऐसे विश्व का निर्माण करना है, जहां क्रोध नहीं करूणा, प्रतिस्पर्धा नहीं आत्मस्पर्धा, युद्ध नहीं शांति, द्वेष नहीं दोस्ती तथा जनमंगल से महामंगल का सृजनात्मक दृष्टिकोण व्याप्त है।


पुष्पगिरी तीर्थ एक : उपलब्धियां अनेक

क्रांतिकारी राष्ट्रसंत मुनि श्री तरूण सागर

पुष्पदंत एक अतिशय तीर्थ है, एक अद्भुत तीर्थ है, एक जीवंत तीर्थ है, एक ऐसा तीर्थ है एक पुष्प तीर्थ है, एक निर्माण तीर्थ है और एक ऐतिहासिक तीर्थ भी है। मतलब पुष्पगिरी एक, रूप अनेक

पुष्पगिरी तीर्थ - अद्भुत तीर्थ इस मायने में कि भले ही इस भूमि पर किसी तीर्थकर ने तप ना किया हो, मोक्ष ना पाया हो लेकिन आने वाले समय में यहां तीर्थकर महावीर जैसी आत्माएं तप जरूर साधेंगी और कर्म क्षय कर मोक्ष भी प्राप्त करेगी। पुष्पगिरी सेवा तीर्थ इन मायने में है कि तीर्थ पर सिर्फ तीर्थकर प्रतिमाओं की पूजा नहीं होगी बल्कि यहां प्रतिभाओं को उभारा और निखारा भी जावेगा और उनकी ऊर्जा को धर्म प्रभावना, समाज सेवा और राष्ट्र कल्याण में नियोजित भी किया जावेगा।

पुष्पगिरी मध्य - तीर्थ इस मायने में है कि इस तीर्थ के चारों ओर जैन तीर्थो की एक विशिष्ट श्रृंखला है। एक तरफ सिद्धवरकूट और ऊन है, तो दूसरी तरफ बावनगजा और गोमटगिरी है। उधर बनेडिया और मक्सी तीर्थ है तो इधर भेजपुर और नेमावर तीर्थ है। आठ जैन तीर्थों के मध्य यह तीर्थ है। अगर कोई श्रद्धालू पुष्पगिरी पर खडे होकर चारो दिशाओं में हाथ जोडकर घूम जाए तो उसे आठ जैन तीर्थों के दर्शन का महान पुण्य सहज ही मिल जाता है। पुष्पगिरी अतिशय-तीर्थ इस मायने में है कि इस तीर्थ पर विराजमान भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा भू-गर्भ से प्राप्त है। मूर्ति अति प्राचीन है और भव्य तो है ही, अतिशयकारी भी है, पुरातात्विक दृष्टि से भी बेजोड है। इससे बडा अतिशय और क्या होगा कि जहां कल तक नफरत, घृणा, जडता और अज्ञानता के कांटे बिखरे पडे थे, आज वहीं सत्यम-शिवम-सुन्दरम के फूल खिल रहे है, और तुम्हें यकीन करना ही होगा कि कल यहां सम्यक दर्शन ज्ञान-चरित्राणि के फल भी लगेंगे। इससे बडा अतिशय और क्या होगा कि सिर्फ दुराग्रहवश आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी का विरोध करने वाले लोग भी पुष्पगिरी के दर्शन-वंदन करने के पश्चात् पुष्पगिरी और पुष्पदंत सागर जी की प्रशंशा करते नहीं अघाते है।

पुष्पगिरी पुष्प-तीर्थ इस मायने में है कि यह तीर्थ आचार्य श्रेष्ठ श्री पुष्पदंत सागर जी की प्रेरणा का प्रसाद है। आचार्य श्री की इस पुष्प वाटिका में आज कई खूबसूरत और महकते फूल खिल रहे है। मैं मुनि तरूण सागर चाहता हूं कि इस बगिया में हर रोज तीन फूल जरूर खिले ताकि एक फूल भगवान पार्श्वनाथ के चरणों में समर्पित कर सके क्योंकि वे मूल नायक है। दूसरा फूल आचार्य श्री के चरणों में चढे क्योंकि वे तीर्थ के शिल्पी है और तीसरे फूल से उस व्यक्ति का अभिनन्दन किया जावे जिसने इस विकास में अपना तन-मन-धन और जीवन न्यौछावर किया है।

आगामी कार्यक्रम

समाचार

अनुभूति के भावोद्गार

पुष्पगिरी तीर्थ क्षेत्र, तीर्थ क्षेत्रों के अतंस्तत्व में सिद्ध क्षेत्र से आगे तथा देश और राज्य की विशिष्ट धरोहर

आचार्य श्री विमल सागर जी के मुख्य मेधावी और प्रभावशील शिष्यों में आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी है, जो आचार्य परम्परा में एक क्रांतिकारी प्रभावक एवं युग धर्म आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित है। उन्होंने मानवीयता के रूप में एक ऐसे प्रकाश पुंज को प्रदान किया है, जिसके समस्त प्रकल्प जीवन निर्माण के संवाहक है।
इसी के अन्तर्गत झोंपडी से लेकर महलों तक घर-घर ही नहीं घट-घट तक आलोक बिखरने के लिए पुष्पगिरी तीर्थ की उत्पत्ति की है। इस पुष्पगिरी तीर्थ से प्राणी मात्र परतंत्रता से मुक्त होकर परमात्मा स्वरूप का आनन्द ले सकेगा। इस तीर्थ क्षेत्र की दर्शन भक्ति से परमार्थ की सिद्धि संभव है, तो सांसारिक सिद्धियों की सिद्धि होना तो मामूली बात है। अतः यह तीर्थ क्षेत्र के अतंस्तत्व में सिद्ध क्षेत्र से बहुत आगे है। यह पुष्पगिरी तीर्थ अपने में योग्य श्रद्धेय, ज्ञेय एवं अनुकरणीय तथा देश और राज्य की विशिष्ट धरोहर है। इससे अधिकतम नागरिक लाभ लेंगे।

इसी भावना के साथ ...............
आचार्य सन्मति सागर (तपस्वी सम्राट)

अनुभूति के भावोद्गार

पुष्पगिरी का निर्माण वास्तुकला पर आधारित

मैंने पुष्पगिरी के प्रथम दर्शन किये। दर्शन करके बहुत शांति मिली। यह क्षेत्र 108 श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज की प्रेरणा से बन रहा है। यहां पर सभी प्रकार की सुविधा उपलब्ध है और वास्तुकला के अनुसार इसका निर्माण हो रहा है इसलिए यहां अतिशय होना स्वाभाविक है। यह भारत वर्ष का प्रथम क्षेत्र जैनियों का है, जिसमें सभी प्रकार की सुविधा और सब दोषों से रहित क्षेत्र का निर्माण हुआ है। यहां के सभी कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद देता हूं कि इसका विकास अच्छी तरह से करें एवं अपने जीवन को सफल बनावें।

आचार्य भरत सागर

अनुभूति के भावोद्गार

पुष्पगिरी के पुष्प

बहुत दिनों से पुष्पगिरी की प्रशंसा सुन रहा था। उस बात को ता. 02.02.2006 को प्रत्यक्ष देखा, देखकर बहुत खुशी हुई। अनेक निर्माण कार्य हो रहे है। उसमें से पुरानी प्रतिमा के मंदिर निर्माण और शिक्षा कार्य का अवलोकन किया, उससे भविष्य में अच्छी धर्म प्रभावना होगी और यहां के कार्यकर्ता लोग भी अच्छे सुचारू रूप से काम करते है, वो भी पुण्य उपार्जन करें, ऐसी शुभकामना।

शुभ आशीर्वाद
आचार्य अभिनन्दन सागर