जब मूर्ति पुष्पगिरी पर आ गई तो पद्मश्री माताजी के शरीर में देवी ने प्रवेश कर कहा, मेरी शुद्धि करो, मेरी शुद्धि करो। दूसरे दिन ब्रह्मचारी को नाग ने डस लिया। एक छोटी बालिका ने आकर बताया कि पहाड के नीचे ब्रह्मचारी मूर्छित पडा है। उसे उठाकर लाए, उसके पांव में सांप के डसने का निशान था। उसी समय एक व्यक्ति के शरीर में देवी आ गई और उसने कहा मेरी शुद्धि करो, तब इसका अतिशय प्रकट होगा, ब्रह्मचारी को वहीं लिटा दिया गया और आचार्य श्री द्वारा शुद्धि करते ही ब्रह्मचारी होश में आ गया।
प्रथम बार वर्ष 1998 में भूमि पूजन के समय भरे पाण्डाल में स्त्रियों के बीच में एक सांप प्रकट हुआ, आचार्य श्री मंच से उतरे, उसे पिच्छी लगाई और मौनपूर्वक पूर्व से पश्चिम की ओर चला गया।
पुष्पगिरी महोत्सव वर्ष 2003-04 के दौरान जिन मंदिर की नींव के पास यक्ष देवता के रूप में नागराज उपस्थित हुए। उनको मुनि श्री पुलक सागर जी महाराज ने आशीर्वाद प्रदान किया। पुष्पगिरी के रक्षक देवता के रूप में नाग-नागिन की उपस्थिति अनेक अवसरों पर यहां बनी रहती है।